Monday, January 11, 2021

 

 दोहा

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शूल संग में फूल है, पुष्प भ्रमर के पास।
दोस्त दुष्ट जब संग हो, कभी न आये रास।।

मिले कभी जब नौकरी, करना नहीं घमंड।
दर्प सदा ही मारता, प्रभु देते हैं दंड।।

अवसर कभी न चूकिये, मन में रहे विचार।
हर जन से बस प्यार हो, चाहे दर्द हजार।।

भूख ही बची अब तो
विधा-कविता
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पैसे के पीछे दौड़ रहा,
भरा नहीं जन का पेट,
पैसों से भरी है तिजोरी,
कहलाता है मोटा सेठ।

रोटी पानी वो भूल गया,
बस पैसा उसे दिखाई दे,
अब तो भूल गया है रब,
पैसे की भूख बची अब।

लिखा बहुत काव्य उसने,
भूल चुका वो अब खाना,
गूढ़ रहस्यों में खोया होता,
असल काव्य को पहचाना।

जगत को बहुत कुछ दिया,
लिख लिख तन गया सूख,
प्यास लिखने की कम हुई,
अभी बची है काव्य भूख।

कुर्सी का चक्कर बुरा होता,
कुर्सी लगे कभी उसे हाथ,
अगर चुनाव वो हार गया,
अपने को समझता अनाथ।

कुर्सी की भूख बहुत बुरी,
कुर्सी लगे नेता को शाकी,
पेट की भूख बेशक खत्म,
कुर्सी की भूख अभी बाकी।


गरीब बेचारा रोता फिरता,
मिलती नहीं जगत में रोटी,
रोटी के चक्कर में फिर रहा,
सूख चली बस बोटी बोटी।

कूड़ा बीन दस बीस कमाए,
फिर भी नहीं  भर पाए पेट,
दर्द बेचारे का न देखे रब तो
पानी तो कहीं से मिल जाए,
बस भूख ही बची अब तो।

आये थे मजदूर कमाने को,
कोरोना की बड़ी मार पड़ी,
निज घर जाना हुआ कठिन,
आई एक कठिन जन घड़ी।

कितनों का हुआ काम बंद,
लगे पेट बड़ा जन पापी है,
थोड़ा बहुत काम मिल गया,
पर भूख अभी भी बाकी है।

मार काट जग में छिड़ी है,
बन गया भाई भाई दुश्मन,
औरत भी जमकर जुर्म करे,
भूल गई बड़ो से चिलमन।

कोई मरे कटे अब बेशक,
दोष न देना धरा व नभ को,
लाख भूख जन की मिटती,
एक भूख ही बची अब तो।।
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गीत/कविता
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तुम बन जाओ गीत मेरे,
मैं नृत्य बनकर गाऊंगी,
तुम बन जाओ भ्रमर तो,
तो फूल बनके आऊंगी।

तुम बन जाओ चितचोर,
मैं प्रेमिका बन लुभाऊंगी,
तुम बनोगे ढ़ोलक अगर,
मैं सारंगी बनके आऊंगी।

तुम मेरे दिल की धउ़कन,
मैं दिल का रूप बनाऊंगी,
तुम बनाकर आओ हँसी,
मैं होठों पर मुस्कराऊंगी।

तुम आग का रूप बनोगे,
मैं पानी बन प्यास बुझाऊं,
जब जब तुम मुझे पुकारो,
मैं संगिनी बन कर आऊंगी।








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