Tuesday, January 05, 2021

 दोहा
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बाबा उसको मानते, जो मिटाये पीर।
पाखंडी बन घूमते, नारी हरते चीर।।

समय समय की बात है, राजा बनते रंक।
भूल गये जो वक्त को, वो मारेगा डंक।।

देख पराये कष्ट को, छुप छुप हँसते आज।
परहित बीते जिंदगी, उन पर हमको नाज।।
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शब्द-बाबा
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बाबा उसको मानते, जो मिटाये पीर।
पाखंडी बन घूमते, नारी हरते चीर।।
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जरा सुनो
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आज का विषय- भ्रष्टाचार
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भ्रष्टाचार वो विष बेल है जिसका समूल नाश असंभव सा लगता है। यह कैंसर भांति फैल चुकी है।
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मेरे कंपित अधरों की भाषा,
जो नय तुम्हारे पढ़ लेते।
तेरे मेरे गम ले लेते और,
हम तुम दोनों हँस लेते।।

दृढ़ संकल्प करें हम मन से,
हिंदी का उत्थान करेंगे।
हिंदी मातृभाषा है भारत की,
जमकर के प्रचार करेंगे।।




मेरा मन

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मेरा मन यह कह रहा, कभी मिलेगा मीत।
बहार आए जिंदगी, दिल गा उठता गीत।।
गीत सुने कोयल कभी, मन में उठे उमंग।
लगे प्रफुल्लित हो रहा, तन मन उभरे रंग।।

मेरा मन यूं कह रहा, आए कभी बहार।
बाग बाग दिल गा पड़े, मिले हसीना प्यार।।
नहीं जगत में दुश्मनी, सबसे हो जन प्रीत।
दोस्ती कभी निभाइये, गाये मिलकर गीत।।

मेरा मन सुंदर लगे, फूलों सी मुस्कान।
अच्छे कर्मों से बने, जग में जन पहचान।।
आगे बढऩा सीख लो, मन के ही अनुसार।
देखों फिर हर रूप में, भरा मिलेगा प्यार।।
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पुस्तक
 विधा-कविता
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पुस्तक, पोथी, बही कहो,
या कहते हैं मोटी किताब,
पढ़कर कभी मन प्रसन्न हो,
कभी घटे चेहरे की आब।
कभी पेज दो चारे मिले,
कभी मिलते पृष्ठ हजार,
कभी भगवत गीता बनती,
कभी नाम दे दो प्रेमी प्यार।
पुस्तक भरा इतिहास पुराना,
पुस्तक में मिलता सर्व ज्ञान,
पुस्तक मन में गर्व करा दे,
पुस्तक लिखके बने पहचान।
विभिन्न भाषाओं में मिलती,
रंग रूप सज्जा मिले हजार,
गद्य, पद्य कही रूप सवैया,
कहीं मिले प्रेम,गाथा,प्यार।
देश विदेश में मिलती है,
पांडुलिपि और पुस्तक,
लेखनी उठाकर लिखते हैं,
नया भाव जब दे मन दस्तक।
हर धर्म की धार्मिक पुस्तक,
भारत में रामायण, महाभारत,
पुस्तक पढ़कर स्वर्ग पहुंच जाये,
अनपढ़ रहकर हो जाये दुर्गत।
पुस्तक में व्यवहार मिले,
पुस्तक भरी संस्कार हजार,
पुस्तक नीति ज्ञान परिपूर्ण,
पुस्तक बिना जीवन बेकार।
जीवन भी एक पुस्तक है,
पढऩा होता अति मुश्किल,
अपने आइने में झांककर देखो,
चेहरा कर रहा है झिलमिल।।

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