कमल/पंकज/ मुक्तक
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1
खिले कमल लो बाग में, मन में उठी हिलोर।
सुबह शाम दिन रात को, दिल को करे विभोर।।
गुदड़ी में हीरा मिले, पाता जग में नाम,
देख कमल को हँस रहे, सोच सोच चितचोर।।
2
नैन कमल से लग रहे, कपोल गुलाब फूल।
प्यार व्यार करते हुये, कर बैठो ना भूल।।
जवानी आती है कभी, मन में उठे उमंग,
बेशक जन कुछ भी कहे, प्यार जगत का मूल।।
कुंडलियां स्वतंत्र
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जब तक तेरे धर्म का , हो ना जाता अन्त ।
हर मौसम तुझ को लगे , जैसे होय बसन्त ।।
जैसे होय बसन्त , ना दूजे होंं प्रभावी ।
पार करे मझधार , सफल कहलाए नावी ।।
दुनिया तेरा मान , करेगी सुन ले तब तक ।
शुभ कर्मों का शेष , रहे खाते में जब तक ।।
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दोहा
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जल का दोहन हो रहा, पहुँच चुका पाताल।
आने वाले वक्त में, जन का हो बदहाल।।
करता ओछे कर्म वो, खुद समझे भगवान।
जन को धोखा दे रहा, वो सच्चा हैवान।।
अपनों को धोखा दिया, करे गैर से प्रीत।
देव पुरुष उसे मानते, दुनिया गाये गीत।।
बदनसीब बचपन
विधा-कविता
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बदनसीब बचपन देखो
सड़कों पर फिरे बेचारा,
ना खाने को रोटी मिले,
कूड़ा बीनता मारा मारा।
गरीब घर में पैदा हुआ,
कर्म का है दोष उधारा,
फटेहाल में रहता है वो,
नहीं महल उसे गवारा।
खेल कूद को न खिलौने,
ना कपड़े है उसके पास,
पीठ पर लदी पोटली है,
टूटी चप्पल उसकी खास।
पढ़ नहीं पाये बदनसीब,
क्या है उससे पाप हुआ,
भरपेट भोजन जब मिले
देता रहता प्रभु को दुआ।
सड़क किनारे सोते मिले,
बैठके पटरी आंसू बहाता,
कूड़े को दिनभर बेचकर,
दस-बीस रुपये ले आता।
वो पैसे भी नसीब नहीं हैं,
छीनकर बापू शराब पीता,
बदनसीब बचपन यही है,
जिंदगी में वो रहता रीता।
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मौन विरह का
विधा-कविता
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विरह वेदना कष्ट देती,
सहते हैं रहकर मौन,
अपने जन भूल जाते,
ढाढ़स बंधाएगा कौन?
विरह में डूबा देख लो,
भूल जाता है सुध बुद्ध,
मंजर देख मन कांपता,
प्रकृति जब होती क्रुद्ध।
नागमती का विरह गीत,
दिल को रख दे झंकोर,
वो दर्द दिल से बह उठे,
जगत में मच जाए शोर।
अभिज्ञान शाकुंतलम में,
कालिदास विरह दे दर्द,
दुष्यंत और शकुंतला की,
मौन बहती हवा सर्द सर्द।
श्रीकृष्ण जब मथुरा गये,
गोपियां हुई बड़ी उदास,
उद्धव उनको समझा रहे,
विरह में बस प्रभु आस।
अपना कोई दूर जाता है,
या फिर कोई स्वर्ग जाए,
विरह बखान कैसे करता,
बस मुंह से निकले हाय।
आंसू भी नहीं बच पाते,
विरह ऐसी हो वो आग,
बोल पाना भी मुश्किल,
डसता मन को जैसे नाग।
पद्मावत में जायसी करे,
बारह मासा गीत विरह,
ऐसी हालात बन जाती,
भूल जाता है जन जिरह।
कामायनी का विरह था,
जन के आंसू देता बहा,
लेखक जयशंकर पहुंचे,
पहुंच ना सके रवि वहां।
मीरा की थी एक वेदना,
श्रीकृष्ण की हुई दीवानी,
ऐसी विरह में खो बैठी,
अपने को नही पहचानी।
तुलसीदास से मिलने को,
प्रभु श्रीराम आये व गये,
विरह वेदना तुलसी सही,
छंद बना डाले नये-नये।
रावण हर ले गया सीता,
विरह वेदना वो खोई थी,
अपने प्रभु श्रीराम खातिर,
कई कई दिन न सोई थी।
भीलनी के बेर खाके प्रभु,
विरह में डूबों गये उनको,
युगों तक विरह वेदना में,
जीना पड़ा था यूं जिनको।
विरह नहीं देना है दाता,
बेशक दे देना एक मौत,
विरह में जलता रहे जन,
जैसे दीप की जले जोत।।
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Saturday, January 09, 2021
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