जरा सुनो
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किसान के बुरे दिन। काट रहा गिन गिन। सरकार बनी जिन्न। पेशा जा रहा छीन।।
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दोहा ***********************
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सूर्य देव की अर्चना, करो भीष्म को याद।
खुशी भरी हो जिंदगी, करते हैं फरियाद।।
पूरब पश्चिम हर दिशा,मचा हुआ है शोर।
करो अर्चना सूर्य की, मकर संक्रांति भोर।।
दाल चूरमा खा रहे, उड़ती खूब पतंग।
दान पुण्य जन कर रहे,मकर संक्रांति रंग।।
गरीब /कविता
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सदियों से चल रहा,
गरीब अमीर में बैर,
गरीब बेचारा दुखी,
उसकी नहीं है खैर।
भूखा नंगा सड़क पर,
घूम रहा है राहों में,
नहीं पता प्रकृति ले,
उसे अपनी बांहों में,
गरीब गरीब रहता है,
किसे सुनाये कहानी,
अमीर इस जगत में,
करते आये मनमानी।
कब बदलेंगे वो दिन,
गरीब के घर में बहार,
सारा देश झूम उठेगा,
जन जन मिलेगा प्यार।।
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उत्तरायण/कविता
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त्योहार अनोखा कहलाए,
मकर संक्रांति जब आए,
धर्म पुण्य में लग जाते हैं,
गजक,रेवड़ी खूब लुभाए।
उत्तरायण का पर्व अनोखा,
सूर्यदेव बदल लेता दिशा,
बूढ़ों को जगाने की प्रथा,
रिवाज दिल दिल में बसा।
भीष्म पितामह प्राण त्यागे,
तभी से दान पुण्य करते हैं,
गौमाता की सेवा कर लो,
पाप कर्म यहां क्यों करते हैं।
गुड़ की गजक,तिल खाये,
पतंग उड़ाये, हंसते यूं गाये,
सूर्य उपासना का पर्व होता,
आओ मिलकर इसे मनाए।
परंपराएं चलती ही रहती हैं,
इंसान जग में आएंगे जाएंगे,
बुजुर्ग हमें जो रास्ता दिखाएं,
उन रास्तों में फूल बिछाएंगे।





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