दोहा
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फूल कली मुरझा रहे, माली तोड़ा नेह।
हवा थपेड़े मारती, नहीं बरसता मेह।।
शरणागत घर आ गया, करो नहीं इंकार।
खान पान सब दो उसे, देना उसको प्यार।।
दक्ष लोग सब जानते, दुनिया है बेकार।
करो भलाई काम तो, मिले जहां का प्यार।।
मेह--का अर्थ बारिश
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दोहा
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शरणागत यूं कह रहा,आया तेरे द्वार।
शरण गुजारूं आपकी, देना मुझको प्यार।।
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नमन दोहा *******************
शरणागत घर आ गया, करो नहीं इंकार।
खान पान सब दो उसे, देना उसको प्यार।।
कुंडलियां-************************
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सत्ता की तृष्णा बुरी , जाग उठे अभिमान ।
तानाशाह हरदम करे , धरती लहूलुहान ।
धरती लहूलुहान , देख जनता घबराती ।
सम्मुख हो चंगेज़ , बड़ा जालिम उत्पाती ।
जो भी होय खिलाफ,कटे उसका ही पत्ता ।
कितना बहता खून,बड़ी जालिम हो सत्ता ।।
यादें/तन्हाई
विधा-कविता
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बिछुड़ चुके हैं आज दिन,
पत्नी और मेरे माता पिता,
यादें उनकी सताती रहती,
क्यों छोड़ा क्या हुई खता।
यादों का सफर पुराना है,
बस काम आना जाना है,
एक बार आई चले जाये,
बस जीवनभर तड़पाना है।
यादें नई पुरानी भी होती,
यादों में यह दुनिया रोती,
यादों का जब दौर चलेगा,
कभी कभी जन हंसाती हैं।
यादों से कह देना न आये,
यादों से कह दो न सताये,
यादों के सहारे जिंदगी है,
यादों का कोई पता बताये।
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आप सुनो तो तान छेड़ दूँ, मन के गीत सुनाने को
विधा-गीत
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आप सुनो तो तान छेड़ दूँ, मन के गीत सुनाने को,
आप कहे तो गीत सुना दूं, अपना वतन बचाने को।
भारत मां के वीर कहूं,माटी की लाज बचाने को,
या फिर तुमको कवि कहता हूं,अपना मन बहलाने को,
धरती मां पर दूं कुर्बानी, अपना फर्ज निभाने को,
आप सुनो तो तान छेड़...............................
त्याग तपस्या गर तुम करते, संत मुनि कहलाओगे,
अपनी गर कुर्बानी देते हो, नया युग तुम लाओगे
मैं तो अपनी कल्पना करता,तुम्हे आज हंसाने को,
आप सुनो तो तान छेड़...............................
दुश्मनों को मार गिराऊं, देश में नाम कमाने को,
मातृभूमि शीश झुकाऊं, माटी की लाज बचाने को,
बार बार बस उन्हें पुकारूं, प्रभु के दर्शन पाने को,
आप सुनो तो तान छेड़...............................।
आप सुनो तो तान छेड़ दूँ, मन के गीत सुनाने को,
आप कहे तो गीत सुना दूं, अपना वतन बचाने को।
आप सुनो तो तान छेड़.........................।।
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इंसानियत
कविता
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इंसानियत के आगे, सारा जहान फीका,
इंसानियत जन माथे लगता चंदन टीका,
इंसानियत जहां मिले वो हो घर अपना,
वरना दर्द की दुनियां में लेना है सपना।
इंसानियत सदा कहे, करना सुंदर काम,
पाप कर्म में डूबकर, हो जाये बदनाम,
बीच राह में गिर पड़े, निश्चित मानों हार,
धोखा मानव कर रहा, पूरे जग बदनाम।
इंसान वही जगत में इंसानियत हो पास,
वरना बिना इंसानियत दुश्मन मिले खास,
इंसानियत के बल पर होता है जग नाम,
इंसानियत बिना होता नहीं पूरा वो काम।
परहित के जो काम हो, करते रहो जरूर,
इंसानियत सदा कहे, अच्छा नहीं गरूर,
सच्चे दिल से सोच ले, धन हाथ का मैल,
इंसानियत सजे सदा, बढ़ता खूब सरूर।
आओ इंसानियत करे धारण मन मंदिर में,
धरती पर देव बन जाये पूजा घर अंदर में,
मिलना है निश्चित प्रभु यदि हो इंसानियत,
पाप कर्म पर चलकर ही होती जन दुर्गत।।







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