अतीत यादें, सपने
विधा-कविता
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अतीत की यादें बहुत सताती,
कभी आती हैं कभी वो जाती,
सपने कभी-कभी ये दिखाकर,
अपनी सारी बातें हमें बताती।
अतीत की यादें कभी कभी तो,
बहुत दुख दर्द जन को दे जाती,
यादों और सपनों को दूर रखना,
दिल को अति सताती तड़पाती।
यादें कभी कभी तो इंसान का,
मन बहुत प्रसन्न कर जाती हैं,
इसलिये यादें दिल में संजोना,
बुरे वक्त पड़े बहुत काम आती।।
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सजना/सजनी
विधा-कहमुकरी
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रजनी बोली सुन कमली,
साजन मेरा बहुत खराब,
खाता पीता कुछ भी नहीं,
बस पीता जमकर शराब।
बर्तन भांडे सब बेच दिये,
खाने को नहीं मिले रोटी,
बहुत बुरे घर दिन आये,
किस्मत मेरी होती खोटी।
कमली बोली, सुन रजनी,
मेरे साजन बहुत ईमानदार,
अपने पैसे दिन कमाये है,
फिर ले आया है वो कार।
जीवन मेरा बहुत सुखी है,
घर में सब हैं मोटर कार,
हाथ में सोने की घड़ी है,
गले पड़ा सोने का हार है।
ओस
विधा-मुक्तक दोहा मुक्तक मात्राएं 13,11
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ओस पड़ी जब घास पर, चमके मोती रूप।
चांदी जैसी चमकती , हो आकर्षित भूप।।
सर्दी का जब माह हो, धुंध बहुत है आम,
सूरज किरणों से सजे, ओस सुंदर अनूप।।
फसल खड़ी हो जब बड़ी, पड़े ओस तब आम।
धुंध देखने को मिले, सुबह दोपहर शाम।।
अपनी फसलें देखकर, प्रसन्न मिले किसान,
अच्छी पैदावार से, बनते बिगड़े काम।।
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जरा सुनो
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आज का विषय-
गणतंत्र की गरिमा पर प्रहार, किसानों की यही हार।
अन्नदाता जो लड़ रहे, खोता जाये उनका आधार।।
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दोहा
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सोच सोच खुश हो रहे, मेहनत होता नाम।
जितना गुड़ डालो कभी, उतना मीठा काम।।
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सोच सोच खुश हो रहे, मेहनत होता नाम।
जितना गुड़ डालो कभी, मीठा मिलता काम।।
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धीरज
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धीरज धारण कीजिये, बिगड़ रहे हो काम।
सहज पके मीठा बने, जग में होगा नाम।।
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कटी फटी पोशाक से, दुखिया सम हालात।
फैशन के इस दौर में, मिली यही सौगात।।
देखा दर्द गरीब का, आया दाता याद।
खाने को वो तरसते, कौन सुने फरियाद।।
आज गणतंत्र कह रहा, शुरू हुआ संविधान।
देशभक्तों की भूमि यह, भारत देश महान।।
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