उल्फत
विधा- छंदबद्ध कविता
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उल्फत में इंसान भी, खो देता पहचान।
कष्टों में जो जी रहा, सच्ची होती शान।।
मेहनत से जो काम ले,आगे बढ़े जरूर।
बाधाओं से ना डरे, बने वो जन महान।।
उल्फत में अपने सभी, मुंह लेते हैं फेर।
सोच समझ ले आज ही, लगा नहीं कुछ देर।।
हिम्मत ही हथियार है, बुरे समय पर जान।
सारी मुश्किल एक दिन, हो जाएंगी ढेर।।
जो मुश्किल में साथ हो, उनको अपना जान।
बीत गया ना लौटता, अब तो ले पहचान।।
आएगा वो दिन कभी, करते रहो प्रयास।
पैर विरोधी छू रहे, उस दिन बढ़ता मान।।
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कहूं
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किससे कहूं व्यथा मैं उर की,
किस पर मैं विश्वास करूं।
किसको दर्द दास्तान सुनाऊ,
किसके पर मैं आस करूं।।
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शब्द-सरहद
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सरहद की रक्षा करे, गजब वीर विश्वास।
माटी का टीका सजे, मारे दुश्मन खास।।
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दोहा
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फूल कली से कह रहा, जग के स्वार्थी लोग।
अपना काम निकालते, अजब गजब का रोग।।
समय
विधा-छंदमुक्त कविता
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समय के साथ चलो,
समय हमको बताए,
समय को ठुकरायेगा,
वो दर्द आयेगी बहार।
संत,देव,मानव,दानव,
समय अनुरूप चलते,
नहीं मानेंगे वक्त की,
मिट्टी में मिल जाये।
गर्व ना कर समय पर,
रावण का मिटा घमंड,
अमर मानते थे जो भी,
हो गया बस अवसान।
समय की पुकार होती,
साथ चलना सीख ले,
वरना पीछे छूट जाएगा,
रोता रह जाएगा बेहाल।
समय घावों की मरहम,
लगाना घावों पर जरूर,
सोच समझकर बोलना,
धरा रह जायेगा गरूर।।
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संतान/औलाद
विधा-कविता
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जीवन नैया पार करे
वो औलाद कहलाए,
अपनों की नौका को,
भवसागर पार लगाए,
खेले जब आंगन में,
संतान सुख मिलता,
मन में खुशियों का,
एक उपवन खिलता।
पूछो उस बांझ नारी,
क्या हो संतान सुख,
छुपती फिरती है वो,
नहीं दिखाती है मुख।
संतान सुख आधार,
देती दिलों को प्यार,
संतान सुख अनमोल,
नहीं मिलता उधार।
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