Thursday, April 23, 2020


-जिजीविषा
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कभी हंसे कभी रुलाए
जीवन ने खेल दिखाए
नहीं थके आगे ही बढ़े
कभी अपने राह दिखाए,
मन में उमंग लिए बढ़ते
कभी गिरते, कभी चढ़ते
बड़ी अब भी एक उमंग
निज कर्मों को खुद गढ़ते,
दिन ढले कभी रात ढ़ले
सुंदर सपने मन में पलते
कभी भविष्य को सोचते
यादों के भी फूल खिलते,
दिल में अभी भी है जोश
नहीं पलता किसी से रोष
आगे बढ़ते रहेंगे सदा ही
जब तक दिल में है जोश।
* होशियार सिंह यादव


याद बहुत आते हो पापा
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जीवन में अंधेरा छा जाता
याद बहुत आते हो पापा
याद जब सुबह शाम करूं
यादों का समा बंध जाता
ढूंढ तुम्हें अपने मन कोने
दृृष्टि पटल पर फिर लाता
तब याद बहुत आते पापा,
हाथ पकड़ सिखलाया था
खुशी का गांव बसाया था
पापा की गोदी आंगन को
निज शयनकक्ष बनाया था
अब वो यादें सम्मुख पाता
अब याद बहुत आते पापा,
बड़ा हुआ खुशियां दे सारी
दर्द मिटाके दूर की बीमारी
गजब मनोहर सूरत तुम्हारी
अब याद आती सूरत प्यारी
दुख सुख को कभी ना मापा
याद बहुत आते बहुत पापा,
जब हुए नाराज तुरंत मनाया
कष्ट मिले तो तुमने सहलाया
परिवार का रखते  थे ख्याल
कभी नहीं पूछा कोई सवाल
हुई शादी जमकर तब  नाचा
अब याद बहुत आते हैं पापा,
सदा मिला तुम्हारा आशीर्वाद
रो रोकर अब आती बस याद
कैसे मिलूं पाऊं नहीं है उपाय
क्रूर होती मृत्यु कहाए जल्लाद
स्वर्ग समान रहा तुम संग नाता
याद बहुत अब आते हो पापा,
कांटों भरा था जीवन का डगर
धन धान्य से भरें आपने घर
करते रहेंगे सदा तुम्हें याद यूं
जीवन हो गया  आपका अमर
सिर पर ओढ़ा करते थे साफा
याद आते हो बहुत अब पापा,
दूर हुए तुम बन गए स्वर्गवासी
कुछ ना सुहाता मन में उदासी
याद सदा आती रहेगी तुम्हारी
दुर्भाग्य है फूटी किस्मत हमारी
सदियों तक मैं नहीं भूल पाता
याद बहुत आते रहोगे यूं पापा।
* होशियार सिंह यादव




जनजीवन, तबाही
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महामारी जब जब आती
लेकर आती बड़ी तबाही
जनजीवन अस्त व्यस्त हो
जनों के बीच बढ़ती खाई,
कोई बचाव में लग जाता
स्वार्थ से भरे कुछ स्वार्थी
समाज सेवा के काम करे
वो कहलाते जन परमार्थी,
कितने बिछुड़ जाते अपने
रह जाते हैं बनकर सपने
जोश यत्न सब काम करेंगे
जीवन दिया सबको रब ने,
जन जीवन तबाह होता है
प्रकृति का होता खिलवाड़
रौद्र रूप धारण  कर लेती
शहर व कस्बे बने उजाड़।




पृथ्वी दिवस
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भार बढ़ गया धरा पर
नहीं रहे पेड़ रखवाले
पानी, पेड़ समाप्त होंगे
मृतप्राय हो धरा वाले,
प्रदूषण बढ़ा रहे खूब
वृक्षों पर चले कुल्हाड़ा
नहीं है रक्षक इस धरा
जन जन ने पेड़ उखाड़ा,
रो रही आज धरा सारी
काट पिट किया विकृृत
कब तक जीवित रहेगी
एक दिन होगी यह मृत,
बचा लो अब धरती को
वरना हो जाओगे बर्बाद
पुस्तकों में छपेगी कहानी
बहुत आएगी धरती याद,
धरती मां  कहलाती आई
देती हमें  धन्य और अन्न
धरती मां  की पूजा करके
खुश होएगा तन और मन।
* होशियार सिंह यादव







-आँख/नजरें
विधा-गजल

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नजरें इनायत होंगी तो
बन जाते बिगड़े काम
नजरें धोखा खा जाए
सारे होते काम तमाम,
आंखों की तराजू को
रखना होता सदा सम
असमान नजरें हो तो
बन जाएगा बड़ा बम,
नजरें गिरे तो सम्मान
नजरें उठे तो अपमान
नजरें ही कयामत हो
नजरों से बनती शान,
आंखों के इशारे करे
मन में बसे गर खोट
समाज में घटेगा मान
पड़ सकते जगत टोंट,
नजरों को संभाल ले
फिर अपना यह जहां
नहीं कोई कुछ कहेगा
घूम लो मन करे वहां।

प्रभाती
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घर में शोभा देते हैं ये, करते प्राणों की रक्षा
तांबे के बर्तन में जल, करे शरीर की सुरक्षा।

विषय-आंधी
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झूठ फुर हो जाता है, चले सच की आंधी
झूठ के आगे न झूके, सच के सेवक गांधी।

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सच झूठ की द्वंद्व चले, बहकते  हैं जन चंद
जब चले सच की आंधी, सच ही हो बुलंद।


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