कविता
***************
******************
************************************ ***************
कोरोना का भय लगे
बोलती नारी हर-हर
पशु को खाना देना है
चारा काटके लाए घर,
निज पेट भर लिया है
पशुओं से दूध लेना है
भूखे पशु दूध नहीं देंगे
उन्हें हरा चारा देना है,
हरियाली दे खुशहाली
देश को उन्नत बनाना है
गोपाल देश बनाकर के
श्रीकृष्ण नाम कमाना है,
चारा गाय को है प्यारा
चारे का मान बढ़ाना है
गाय हमारी मां कहाती
गाय को गले लगाना है।
****************
*होशियार सिंह यादव
।। हम /तुम ।।
**********************
*******************************
*************************
दो दिलों की यह कहानी
कहलाते है हम और तुम
एक गर नहीं मिलता तो
झटपट होए मुस्कान गुम,
गाड़ी के मिलते दो पहिये
दोनों का हो काम समान
एक अगर टूट जाएगा तो
निश्चित होगा काम तमाम,
दो फूलों की होती बगिया
दोनों महकते चहकते रहे
एक अगर मुरझा जाए तो
माली इसे बाग नहीं कहे,
सदा सदा मुस्कराते रहिये
यह जीवन की निशानी है
न जाने कब वक्त बदलता
बुलबुले सम जिंदगानी है।
****************
स्वरचित मौलिक रचना।
*होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
रंगीला बचपन
**********************
*************************
************************
चेहरे पर मुस्कान हो
दिल में भरा हो जोश
खेलते निज इच्छा से
चाहे बताए इसे दोष,
सावन सी ले अंगड़ाई
मुख से करे फिर शोर
घूमा करते गलियों में
जैसे नाच रहा हो मोर,
उन्मुक्त गगन नीचे रह
दिखलाते कई करतब
दिनभर नहीं थकते हैं
शाम हो घर आए तब,
कभी हंसते कभी रोते
आनंद आता छेड़छाड़
कभी पड़ोसी तंग करे
कभी बापू देता लताड़,
खेलकूद में हो चोटिल
फिर भी हंसते रहते हैं
अपने पराये में ना भेद
जन हमें बच्चे कहते हैं,
जीवनभर रहे यह याद
कोई नहीं हो फरियाद
पढऩे में जी नहीं करता
नहीं करते कोई इमदाद,
रंगीला बचपन' होता है
यौवन मस्ताना होता है
वानप्रस्थ में ईश्वर भजन
बुढ़ापा देख जन रोता है।
*होशियार सिंह यादव
रंगीला बचपन
**************************
************************************
चेहरे पर मुस्कान हो
दिल में भरा हो जोश
खेलते निज इच्छा से
चाहे बताए इसे दोष,
सावन सी ले अंगड़ाई
मुख से करे फिर शोर
घूमा करते गलियों में
जैसे नाच रहा हो मोर,
उन्मुक्त गगन नीचे रह
दिखलाते कई करतब
दिनभर नहीं थकते हैं
शाम हो घर आए तब,
कभी हंसते कभी रोते
आनंद आता छेड़छाड़
कभी पड़ोसी तंग करे
कभी बापू देता लताड़,
खेलकूद में हो चोटिल
फिर भी हंसते रहते हैं
अपने पराये में ना भेद
जन हमें बच्चे कहते हैं,
जीवनभर रहे यह याद
कोई नहीं हो फरियाद
पढऩे में जी नहीं करता
नहीं करते कोई इमदाद,
बचपन सुहाना होता है
यौवन मस्ताना होता है
वानप्रस्थ में ईश्वर भजन
बुढ़ापा देख जन रोता है।
***************
******************
************************************ ***************
कोरोना का भय लगे
बोलती नारी हर-हर
पशु को खाना देना है
चारा काटके लाए घर,
निज पेट भर लिया है
पशुओं से दूध लेना है
भूखे पशु दूध नहीं देंगे
उन्हें हरा चारा देना है,
हरियाली दे खुशहाली
देश को उन्नत बनाना है
गोपाल देश बनाकर के
श्रीकृष्ण नाम कमाना है,
चारा गाय को है प्यारा
चारे का मान बढ़ाना है
गाय हमारी मां कहाती
गाय को गले लगाना है।
****************
*होशियार सिंह यादव
।। हम /तुम ।।
**********************
*******************************
*************************
दो दिलों की यह कहानी
कहलाते है हम और तुम
एक गर नहीं मिलता तो
झटपट होए मुस्कान गुम,
गाड़ी के मिलते दो पहिये
दोनों का हो काम समान
एक अगर टूट जाएगा तो
निश्चित होगा काम तमाम,
दो फूलों की होती बगिया
दोनों महकते चहकते रहे
एक अगर मुरझा जाए तो
माली इसे बाग नहीं कहे,
सदा सदा मुस्कराते रहिये
यह जीवन की निशानी है
न जाने कब वक्त बदलता
बुलबुले सम जिंदगानी है।
****************
स्वरचित मौलिक रचना।
*होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
रंगीला बचपन
**********************
*************************
************************
चेहरे पर मुस्कान हो
दिल में भरा हो जोश
खेलते निज इच्छा से
चाहे बताए इसे दोष,
सावन सी ले अंगड़ाई
मुख से करे फिर शोर
घूमा करते गलियों में
जैसे नाच रहा हो मोर,
उन्मुक्त गगन नीचे रह
दिखलाते कई करतब
दिनभर नहीं थकते हैं
शाम हो घर आए तब,
कभी हंसते कभी रोते
आनंद आता छेड़छाड़
कभी पड़ोसी तंग करे
कभी बापू देता लताड़,
खेलकूद में हो चोटिल
फिर भी हंसते रहते हैं
अपने पराये में ना भेद
जन हमें बच्चे कहते हैं,
जीवनभर रहे यह याद
कोई नहीं हो फरियाद
पढऩे में जी नहीं करता
नहीं करते कोई इमदाद,
रंगीला बचपन' होता है
यौवन मस्ताना होता है
वानप्रस्थ में ईश्वर भजन
बुढ़ापा देख जन रोता है।
*होशियार सिंह यादव
रंगीला बचपन
**************************
************************************
चेहरे पर मुस्कान हो
दिल में भरा हो जोश
खेलते निज इच्छा से
चाहे बताए इसे दोष,
सावन सी ले अंगड़ाई
मुख से करे फिर शोर
घूमा करते गलियों में
जैसे नाच रहा हो मोर,
उन्मुक्त गगन नीचे रह
दिखलाते कई करतब
दिनभर नहीं थकते हैं
शाम हो घर आए तब,
कभी हंसते कभी रोते
आनंद आता छेड़छाड़
कभी पड़ोसी तंग करे
कभी बापू देता लताड़,
खेलकूद में हो चोटिल
फिर भी हंसते रहते हैं
अपने पराये में ना भेद
जन हमें बच्चे कहते हैं,
जीवनभर रहे यह याद
कोई नहीं हो फरियाद
पढऩे में जी नहीं करता
नहीं करते कोई इमदाद,
बचपन सुहाना होता है
यौवन मस्ताना होता है
वानप्रस्थ में ईश्वर भजन
बुढ़ापा देख जन रोता है।


No comments:
Post a Comment