आंखों को मिला क्या
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विधा-कविता
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देख रहे अत्याचार जन, शब्द रहे नहीं बोल,
आंखें खुली होकर देखे,भेद रही सभी खोल,
इस जग में आंखें सदा, तराजू सम रही तोल,
शुभ कर्म कर ले सदा,कहलाते बस अनमोल।
अत्याचारों को देखकर, आंखें रहती हो शांत,
उन आंखों को क्या मिले,रखती नहीं हो मान,
रो रहे हो बाल,नारी, सहते रहे जन देख देख,
जीना नहीं हो इंसान का,पीते रहे जो अपमान।
आंखें ही होती जहां में, रखती जर्रे पर नजर,
कभी अपनों पर रखे, कभी नजरें टिकती घर,
रास्ते में कांटे पड़े हो,चलना हो जायेगा दुभर,
अपमानों को सहकर जीये, क्या जीना है नर।
शांत भाव से सहते बुराई,वो भी हो अपमान,
नहीं कोई बदला लेता, वो होता जग अज्ञान,
पाप बुराई से बचाता, वो होता है बड़ा दान,
अपने सत्कर्मों के बल पर, बनती है वो शान।
आंखों को मिला क्या, जिसने देखा जग पाप,
उन आंखों का क्या जीना, देते देखे जन श्राप,
जीवन से मृत्यु तक जन,क्या क्या जग देखता,
स्वर्ग की राह मिले,कर लेना प्रभु का ही जाप।
आंखों को मिला क्या, जब देखे दर्द में इंसान,
दूसरे के दर्द उठा ले, वो कहलाता जग महान,
आया है जग में इंसान,करने को कोई सत्काम,
लूटपाट,धोखे,फरेब करे, वो जगत में है अज्ञान।
लाख छुपाये पता लगेगा, ये आंखें बता देती हैं,
कितने ताने बाने बुनती,कितने ही कष्ट सहती है,
आंखों को मिला क्या,जो सहकर कष्ट खत्म हो,
अपनों पर अन्याय कभी हो, पल पल बहती है।
आंखों को मिला क्या, प्यार दुलार से रहती दूर,
उन आंखों का नाम नहीं, जिनमें नहीं होता नूर,
आंखें तो शोभा देती जब, कहलाती हो कोई हूर,
आंखों में बसता जीवन,करना नहीं कभी गरूर।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400
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