Thursday, July 07, 2022

    तू मुझ में ही तो है
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विधा-कविता   
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वक्त की बंदिशों ने बनाया कुछ ऐसा,
पहले जो आलम था नहीं अब वैसा।
एक दूजे के होते थे, अब लगते जुदा,
तू मुझ में ही तो है, देखों हूं मैं कैसा।।

पहुंचा प्रभु की चौखट दर्शन भी पाया,
ऐसा लगा आज दाता बड़ा मुस्कराया।
बोला प्रभु सुन ले, तू मुझ में ही तो है,
फिर क्यों न याद किया,यहां पर आया।।

माटी को जब लोंदा, समझ में यूं आया,
माटी ने हँसकर मुझको पास में बुलाया।
बोली माटी पुचकार के मुझे,सुन ले बात,
तू मुझ में ही मिलेगा,अंतिम दिन आया।।

हवा से करनी चाही जब मैंने हँसके बात,
सपनों की दिल से चल पड़ी मधुर बारात।
हवा ने कहा सुन तू भी अंश होता है मेरा,
तू मुझ में ही तो होगा,जब आएगी वो रात।।

झांका समुद्र में लगा चहुं ओर भरा है पानी,
आता है बुढ़ापा भी जब चली जाये जवानी।
कहा पानी ने पास बिठाकर,गर्व कभी न कर,
तू मुझ में ही तो होगा,कर ले चाहे मनमानी।।

एक रोज भार्या मुस्कराई और सामने आई,
पूछा क्या राज है मन में इतना जो मुस्कराई।
मत इतराओ इतना सुन ले आज यह पैगाम,
तू मुझ में ही तो बसती हो,छवि दिल बसाई।।

सर्दी के दिन थे जलाए बैठा था घर पे आग,
धुन निकली आग से, सुना डाला एक राग।
कहा अग्रि ने आज तू तप ले ले ले सहारा,
तू मुझ में ही तो होगा, तेरा शरीर मुझे प्यारा।।

देखा आकाश पर झिलमिल कर रहे थे तारे,
कितने ही चमक रहे थे जो कभी हुये हमारे।
आई एक रश्मि बोली सुन ले सुंदर सी बात,
तू मुझ में ही तो होगा, जब आये अंतिम रात।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
  फोन 09416348400





















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