राखी
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विधा-कविता
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यम यमी का नाम, लेते लोग हर बार,
रक्षासूत्र यमी बांधा,मिला एक वरदान।
बहन भाई को राखी बांधे,बनूंगा रक्षक,
पूरे जहां में उसकी ही,बनी रहेगी शान।।
शीशुपाल वध किया, द्रोपदी बांधा चीर,
कृष्ण जी ने चीर हरण,हर ली थी पीर।
तब से रक्षा बंधन चला,आज भी चलता,
बहन भाई के दिल में, अनहद प्रेम पलता।
खुशियां लेकर आता, राखी का त्योहार,
भाई बहना हँस रहे, बढ़े सदा यूं प्यार।
जब तक भाई रहेगा,तब तक रहे बहना,
भाई की खातिर करें, बहना जग हजार।।
अटूट बंधन प्रेम का, राखी का त्योहार,
इस राखी में बंधा है, भाई बहना प्यार,
ऐसा पर्व कभी नहीं,आता ले लो हजार,
बेहना की रक्षा खातिर,भाई खड़ा तैयार।
एक वर्ष में आता है, बेसब्री से इंतजार,
राखी के पर्व में,यम यमी सा बंधा प्यार,
बहन जाती या भाई जाए, जाएगा जरूर,
मन खुशी से भरा हाता, नहीं होता गरूर।
एक एक धागे में, लाखों भरे आशीर्वाद,
इस राखी, इस बंधन को, रखते हैं याद,
यमराज भी देखकर प्यार,झुकता एकबार,
बहना के प्यार पर, कुर्बान जीवन हजार।
रक्षा पर्व यह कह रहा, उम्र हो वर्ष हजार,
हर वर्ष यह पर्व आये, बढ़ाये जन में प्यार,
बहन भाई को दे कहे, जीओ सालों साल,
जिंदगी में जीत मिले, कभी मिले नहीं हार।।
मेवाड़ की कर्णवती, भेजी हुमायू को राखी,
हुमायू ने लाज की खातिर,पहुंचा था मेवाड़।
रानी कर्णवती जौहर हुई, पूरे जगत में नाम,
रक्षा बंधन जब आये, आती याद यह शाम।।
सिकंदर पत्नी ने, पोरस को भेकजी थी राखी,
महाभारत युद्ध में, सैनिकों को बांधी राखी।
गुरुकुल में रक्षासूत्र, राखी का होता है रूप,
राखी वचन निभाते, चाहे प्रजा या हो भूप।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400

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