Thursday, August 04, 2022


अब नहीं आती चिट्ठियां
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कविता
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अब नहीं आती चिट्ठियां, अब आते हैं संदेश,
चिट्ठियों ने बदला अब, मोबाइल का भेष।
युवा,बुजुर्ग,औरत हर इंसान, बन गया हैं फैन,
कहते सुना गया है, युवाओं ने बिगाड़ा है देश।।
कभी आती थी चिट्ठियां, गम और खुशी साथ,
पढ़ते रहते थे उसे घंटों, एक और दूजे के हाथ।
वीर गये मां की सेवा में, हो गये जाकर शहीद,
कभी कभी तो बच्चे भी हो जाते थे तब अनाथ।।
डाकिया लाकर देता था, करते घर घर इंतजार,
पढऩे की खातिर बुलाते, लिखा पढ़ा जो इंसान।
गम और खुशी शब्दों में भरी, कभी आता प्यार,
परदेश गये पतिदेव का, नारी करती रहे इंतजार।।
खत, चिट्ठी या लिफाफा, पूरे लबालब होते भरे,
एक एक शब्द में जान डाल दे, होते शब्द खरे।
कभी सुनने वाले प्रसन्न हो, कभी लगे डरे डरे,
कभी युद्ध की बात मिले, कितने साथी यूं मरे।।
क्या अजब जमाना था, फोन नहीं कभी होते,
कभी फौजी को गम में देख, दिल से ही रोते।
तीन चार दिन लग जाते, चिट्ठी आने जाने में,
पाक चिट्ठी मन प्रसन्न,छाती से लगाकर सोते।।
बदल गया है अब युग, चिट्ठी गधे का सींग,
जैसे खत्म कर दी जन, सावन की अब पींग।
पर वो जमाना बेहतर था, बुजुर्गों ने भी झेला,
अब तो हर जन को बस,देखा फोन झमेला।।
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स्वरचित एवं नितांत मौलिक
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-डा होशियार सिंह यादव
कनीना, जिला-महेंद्रगढ़, हरियाणा

फोन 09416348400

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