नारी
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विधा- कविता
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अधरों पर लालिमा, सिर पर घट का वास,
देखे कोई सुंदर मूर्त तो, रुक जाएगी सांस।
देव मुनि,दानव सभी, रहे हैं नारी के दास,
उनकी संगति हर जन को, आती है रास।।
घट को रखके चल पड़ी, करे अति शृंगार,
अपने दिल में रखती,चाहत का इक संसार।
सम्मुख कोई आन पड़े, मानों निश्चित हार,
उसका जग में रहता, इस सुंदर सा प्यार।।
कभी जहां में राज था, आज वक्त की मार,
नारी को चाहिए , पूरे जगत का इक प्यार।
सुंदर नयन नारी के, हर जन पर हैं उधार,
पर नारी कहलाती है, चलना तलवार धार।।
धर्म कर्म में आगे है, नहीं किसी से कम,
करो मुकाबला देख लो, अजमाकर दम।
पर दुर्दशा नारी देख, आंखें होती हैं नम,
यूं ही बर्बरता चली, निकलेगा जन दम।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
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