Wednesday, August 10, 2022

 जहां तक हो



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विधा-कविता   
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जहां तक हो, कर लो गरीब की सेवा,
जिंदगी भर दुआ देंगे, वो काम आएगी।
पता नहीं पल भर का, क्यों इतराते हो,
एक बुलबुले सम,यह यूं चली जाएगी।।

जहां तक हो सके, बना प्यार की राह,
दुश्मनी जीवन भर, जन को सताएगी।
प्यार मुहब्बत में लुट जा, है काम की,
कमा ले धन दौलत,ये धरी रह जाएगी।।

जहां तक हो सके,कर ले जन का हित,
पाप,अधर्म बस तेरा नाश कर कर देंगे।
ये दोस्त तेरा छोड़ देंगे साथ, जरा सोच,
मौका मिला तो झट से धन छीन लेंगे।।

जहां तक हो सके तो, इंसान बनना है,
दुनिया में हजारों तो बन हैवान रहते हैं।
अच्छाई का फल मिलता मरने के बाद,
जग के लाखों साधु संत यही कहते हैं।।

जहां तक हो सके,भज ले नाम ईश्वर का,
यही वो सच्चा मित्र है, जो साथ देता है।
जहान में जिस पर घमंड, तुझे मिलता है,
वहीं जन एक तुझे पल में लूट लेता है।।

जहां तक हो सके,दुखा न दिल जन का,
बांट दे यह धन, बस आशीर्वाद पा लेना।
जिंदगी छोड़के जाना है,उस प्रभु के पास,
वहां कुछ साथ न जाये,हिसाब सब देना।।

जहां तक हो सके, सम्मान करना सीखो,
अपमान से दूर रहो,यूं नहीं कभी झीखो।
दर्द होता है कभी,खुद पर आन पड़ती है,
कभी ऐसी ही दास्तान,खुद की ही लिखो।।

जहां तक हो सके, खुशियां से घर भरो,
अगर कहीं हो सके,उस दाता से ही डरो।
एक दिन सब कुछ यहीं पड़ा रह जायेगा,
मौत भी गर आ जाए तो शान से तुम मरो।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
  फोन 09416348400






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