कैफियत
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विधा-कविता
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कैफियत के लिए गये, वो मिला भला चंगा,
चाहे कोई काम करो, पर लेना कभी न पंगा।
जाना होता इस जग से, जगत हो एक सराय,
जीवन ऐसा हो इंसान, जैसे पवित्र होती गंगा।।
कैफियत गये अस्पताल,मिला अति परेशान,
रोग दूर नहीं हो रहा, निकल रही थी जान।
एक दिन ऐसा आता है, साथ कोई न देता,
हंसते गाते सो जाये, चादर एक लंबी तान।।
चार दिनों की जिंदगानी, पूछो सबका हाल,
पता नहीं किस दिन,बदले जमाने की चाल।
आज हम लो हँस रहे, कहल होंगे बदहाल,
पता नहीं किस घड़ी, होता जन मालामाल।।
जितना हंसना होता है,उतना ही रोना पड़ता,
धन दौलत पास मिले,पर फिर पड़ता सडऩा।
मात पिता और गुरुदेव समक्ष,कभी न अडऩा,
कपोल कल्पित बातें जग,कभी नहीं है घडऩा।।
कैफियत जानों मात पिता, जिन्हें तुमको पाला,
ऐसे कष्ट बताएंगे वो, मुंह पर लग जाये ताला।
सदा समदृष्टि रखो,हटा लेना आंखों का जाला,
संशय की बात चले जब,कहते दाल में काला।।
दर्द में डूबा मिलता है जन,किसको क्या कहेंगे,
जब तक यह दुनियादारी है, सुख दुख यूं रहेंगे।
दोस्त बना अपनों को, पराया कोई नहीं होता है,
एक दिन जब वो बिछुड़ जाये,नयन यूं ही बहेंगे।
राजा हो या रंक सभी को, जाना होता है जरूर,
फिर किस बात पर है, किस चीज का हो गरूर।
मिल जाये जैसा चाहा, खुशनसीबी कहलाती है,
अच्छे दिन जब आ जाये, मुख पर आता है नूर।।
कैफियत की बात सुनी, आया मन एक विचार,
जहां में कितने लोग हैं, देते हर जन को प्यार।
मुंह फुलाये घूम रहे जन, कैसी होती जिंदगानी,
प्रेम प्रीत इस जहां में कहलाती है जन आधार।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400

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