सूखे पत्ते भी
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विधा-कविता
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सूखे पत्ते भी, कर सकते हैं पैदा आग,
सूखे कांटे भी,बन सकते हैं जैसे नाग।
संभलकर चलो, इस जमाने में हमेशा,
चलते चलते राह में, लग जाते हैं दाग।।
सूखे पत्ते भी, अपनी गवाही देते मूक,
कभी होते हरेभरे, मिटाये इंसान भूख।
सर्दी के मौसम में जलकर,देते हैं अग्रि,
समय पर चलना सीखो,करनी न चूक।।
सूखे पत्ते भी, बन जाते हैं एक चिंगारी,
सुलग उठते जब, कर सकते हैं संहार।
जला सकते हैं वक्त पर,आयेगा आवेश,
इन सूखे पत्तों से ही,कर लेना है प्यार।।
सूखे पत्ते भी,वक्त बदले बनता है खाद,
पैदा होते फल फूल, खाकर आए स्वाद।
सूखकर कांटे जब बनते,बुजुर्ग आते याद,
बुजुर्गों से भी कुछ सीखो,यही फरियाद।।
सूखे पत्ते भी, आते हैं वक्त पड़े पे याद,
बीत गये जो दिन, आते हैं जमकर याद।
खत्म हो जाते हैं जग से, होते हैं जल्लाद,
सब कुछ अच्छा हो तो,करते हैं इमदाद।।
सूखे पत्ते भी,जलकर देते हैं एक शिक्षा,
हिम्मत से काम लेना, मांग नहीं भीक्षा।
सदा नहीं मिलते, जीवन में दिन बराबर,
हिम्मत से काम न ले,चलानी है रिक्षा।।
सूखे पत्ते भी, कहलाते थे कभी सजीव,
आज सूखकर खत्म हैं, नहीं थे निर्जीव।
जिंदगी मिलती है, चाहे मिलता हो पात,
साधना का आधा है,सतत अभ्यास नींव।।
सूखे पत्ते भी, होते हैं कभी पेड़ के भाग,
सूख गये हैं वो आज,देते जलकर आग।
सोना होता है बुरा,अब तो लेना तू जाग,
कर ले कोई यत्न, गाना नहीं है जग राग।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400










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