क्या कहूं
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विधा-कविता
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भ्रष्टाचार बढ़ा देश में, आकंठ डूबे आज,
पीकर खून गरीब का,करते उन पर राज।
देख-देख मन दुखी, अब कैसे चुप रहूं,
आवाज निज बुलंद कर, मैं तो कुछ कहंू।।
चहुं ओर धन लालसा, करते नहीं प्यार,
एक दूजे को मारने को,करें जमकर वार।
लोगों की इन बातों पर, मैं कैसे चुप रहूं,
देशभक्ति दिल में, ऐसे में में मैं कुछ कहूं।
भाई का दुश्मन है भाई, कौन किसे चाहे,
जहां भी कुछ शब्द सुने,निकले हाय हाय।
दर्द जमाने का देखकर, कैसे दर्द को सहूं,
ऐसे में जुबान खोलकर, मैं कुछ तो कहूं।।
रात दिन कमा रहे हैं, फिर भी नहीं चैन,
पैसे की खातिर, क्या क्या करते हैं सहन।
भौतिकवाद युग में, मैं कुछ भी नहीं कहूं,
पर हौसले बुलंद हैं, मुख से मैं कुछ कहूं।
बेईमानी सिर चढ़ बोले, फिर देश महान,
अपराधों के बल पे होती है जन पहचान।
आज देखकर दर्द हो,सड़कों पर बहे लहू,
ऐसे इस माहौल में, मैं तो कैसे चुप रहूं।।
आज नहीं वो प्यार जगत,देते सभी दुहाई,
श्रवण कुमार की वो छवि, दिल में बसाई।
हर बात में दर्द भरा, मैं उसको कैसे सहूं,
शांत रहना है बुरा, मैं भी कुछ जरूर कहूं।।
बंधन ढीले हो गये हैं, नहीं आज मां बाप,
पाप कर्म बढ़ गये इतने, नहीं रहा है माप।
अपने दिल के दर्द को अब,मैं किससे कहूं,
पर बुराई बुरी होती, उसको मैं कैसे सहूं।।
नाग सम बने हैं लोग,लेते हैं झटपट डस,
देख जमाने की यारी, दिल कहता है बस।
बहुत सहे हैं दर्द, अब और नहीं मैं सहूं,
रो रोकर पुकारेगी धरा, मैं कैसे चुप रहू।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिं
ह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400




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