चारण भाट
चारण भाट मिलते थे कभी,
करते फिरते राजा गुणगान।
चंद चांदी के सिक्कों खातिर,
खो देते थे अपनी पहचान।।
आज वक्त मिलते ऐसे लोग,
जिनको लगा चापलूसी रोग।
मेहनत से कमाना नहीं जाने,
तलुवे चाट लगाते रोटी भोग।।
***डा. होशियार सिंह यादव
कनीना,महेंद्रगढ़, हरियाणा***
ऊंट
रेगिस्तान का जहाज कहलाए,
कम पानी पी चलता ही जाये।
रेत में नहीं धंसते इसके ये पैर,
हर पौधे को खाए सबसे है बैर।।
सवारी का है यह साधन पुराना,
हल चलाने का आता रहा काम।
लुप्त होने की कगार पर हैं आज,
करता था कभी दिलों पर राज।।
**डा. होशियार सिंह यादव
कनीना, महेंद्रगढ़, हरियाणा

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