साथ
जितने दिन का साथ लिखा था
बस उतना ही साथ निभाया था।
आठ साल जीवनसंगिनी बनके,
हंस-हंसकर समय बिताया था।।
कभी नहीं अनबन हुई दोनों में,
समय उड़ चला पंख लगाकर।
तीन साल गंभीर रोग चला था,
बीता था समय बस रो-रोकर।।
जयपुर,एम्स,जालंधर ली दवाएं,
नहीं बचा पाए तुम्हारी भी जान।
पानी की तरह बहाये गये पैसे,
फिर भी लोग बैठे बन अज्ञान।।
**डा. होशियार सिंह यादव,
कनीना, महेंद्रगढ़, हरियाणा
बिछुडऩे का गम
कितने आये कितने ही गये,
यह कथनी बड़ी पुरानी है।
पर एक बात दिल से पूछो,
बिछुडऩे पर कोई हानि है?
प्रिय अपना कोई बिछुडग़ा,
दर्द हिये में उठता है अपार।
जीत गये चाहे जग को वो,
फिर भी निश्चित होती हार।।
कोई जल्दी जग से न रूठे,
बुद्धि और बल बड़ी हानि।
अपना तो अपना होता सदा,
संत महात्माओं ने भी मानी।।
***डा. होशियार सिंह यादव
कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा**
सुमन
मन से सुमन कहलाती थी,
हर मन को बड़ा हर्षाती थी।
घर में खुशियां छा जाती थी,
जब सामने तुम आ जाती थी।।
मां को भी प्यारी लगती थी,
परिजन दिलों में बसती थी।
सास देखके प्रसन्न होती थी,
बिछुडऩे पर दर्द में रोती थी।।
जाने का दर्द दे गई जग में,
किसको अपनी बात सुनाये।
धोखा अब लगता जाने का,
दे गई लाखों दुख दर्द सजाएं।।
***डा. होशियार सिंह यादव
विश्व रिकार्डधारक,कनीना,हरि.

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