रोग
जिस घर में रोग मिलेंगे,
घरवाले हो जाते परेशान।
खुशियों में जीवन बीतता,
वो मिलते दुख से अंजान।।
कई बीमारी जग में फैली,
कई मौत के शिकार हुये।
जिंदगी का दस्तूर यही है,
आए जग में वो चले गये।।
**डा. होशियार सिंह यादव
कनीना, जिला-महेंद्रगढ़,हरि.
रोग
ज्यादा खाना खाते हैं जो जन,
बन जाता है एक दिन वो रोग।
खाना उतना खाना चाहिए जैसे,
देवताओं को लगाते हम भोग।।
जीने के लिए कुछ खाते देखे हैं,
कुछ खाने के लिए ही जीते हैं।
कुछ जल को दारू रूप में पीते,
कुछ दारू को जल समझ पीते है।।
***डा. होशियार सिंह यादव,


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